
प्रस्तुत पुस्तक के विषय में विशेष कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी उन इने-गिने चिंतकों में से हैं, जिनकी मूल निष्ठा भारत की पुरानी संस्कृति में है, लेकिन साथ ही नूतनता का आश्चर्यजनक सामंजस्य भी उनमें पाया जाता है। भारतीय संस्कृति, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष भी उनमें पाया जाता है। भारतीय संस्कृति, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष और विभिन्न धर्मो का उन्होंने गहराई के साथ अध्ययन किया है। उनकी विद्वत्ता की झलक इस पुस्तक के निबंधों में स्पष्ट दिखाई देती है। लेखक की एक झलक की एक और विशेषता है। वह यह कि छोटी-से-छोटी चीज में भी वह सूक्ष्म दृष्टि से देखते हैं। वसंत आता है, हमारे आस-पास की वनस्पति रंग-बिरंगे पुष्पों से आच्छादित हो उठती है, लेकिन उसमें से कितने हैं, जो उसके आकर्षक रूप को देख और पसंद कर पाते हैं ? अपनी जन्मभूमि का इतिहास हममें से कितने जानते हैं ? पर द्विवेदीजी की पैनी आँखें उन छोटी, पर महत्त्वपूर्ण चीजों को बिना देखे नहीं रह सकीं। शिक्षा और साहित्य के बारे में द्विवेदी जी का दृष्टिकोण बहुत ही स्वस्थ है। पाठक देखेंगे कि तद्विषयक निबन्धों में साहित्य एवं शिक्षा को जनहित की उन्होंने एक नवीन दिशा सुझाई है। यदि उसका अनुसरण किया जा सकें तो राष्ट्र-उत्थान के लिए बड़ा काम हो सकता है। पुस्तक की भाषा और शैली के बारे में तो कहना ही क्या ? भाषा चुस्त और शैली प्रवाहयुक्त है। कहीं-कहीं पर कठिन शब्द के साथ कुछ ऐसा वातावरण रहता है कि कभी-कभी कठिन शब्दों के प्रयोग से बचा नहीं जा सकता।