कोई भी यात्रा मात्र व्यक्ति की यात्रा नहीं होती ! अगर वह जिस रस्ते पर चल रहा है वह रास्ता भी यात्रा में शामिल है तो-और रस्ते शामिल हैं तो क्या कुछ नहीं शामिल ! ‘अरे यायावर रहेगा याद’ अज्ञेय का एक ऐसा ही यात्रा-संस्मारत है जिसमें रस्ते शामिल हैं ! इसलिए यह पुस्तक अपने काल के भीतर और बहार एक प्रक्रिया, एक विचार और एक विमर्श भी है ! बगैर उद्घोष की यात्रा प्रकृति और भूगोल से गुजरती हुई संस्कृति, समाज और सभ्यता से भी गुजर रही होती है ! अज्ञेय की यह पुस्तक इस मायने में एक कालातीत मिसाल लगती है कि इसके बहाने द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर पुरे हिंदुस्तान की आजादी तक का वह भूगोल और कालखंड सामने आते हैं जहाँ जितने अधिक सपने थे उतने ही यातनाओं के मंजर भिया ! यह पुस्तक एक व्यक्ति के विपरीत नहीं, बल्कि समक्ष एक &