सीता जा चुकी थीं, किन्तु सच तो यह था कि वे शरीर से भले ही नहीं थीं, किन्तु लोगों के हृदय में उनका साम्राज्य था। शाम हो चुकी थी। मन कुछ उदास सा हो रहा था। वे नित्य के विपरीत अपने कक्ष में जाने के स्थान पर, महल की सीढ़ियों की ओर बढ़ गये। छत पर पहुँचे तो हवा ठंढ़ी और कुछ तेज थी। उन्होंने खड़े हो कर आसमान की ओर ऐसे देखा जैसे कुछ खोज रहे हों। फिर उस ओर देखा जिधर वह स्थान था जिस तक प्रयाण से पूर्व सीता के पदचिन्ह मिले थे। कुछ देर तक वे अपलक उधर देखते रहे, फिर सिर झुकाकर धीमे कदमों से चलते हुये छत के उस किनारे पर आ गये जहाँ मिट्टी के पात्रों में फूलों के बहुत से पौधे लगे हुये थे। सीता जब थीं, तब उन्होंने इन पात्रों में फूलों के पौधे लगवाये थे। वे पौधों का बहुत ध्यान रखती थीं। उनके जाने के बाद राम अक्सर इन पौधों के ê